दिवाली - लक्ष्मी पूजा क्यों की जाती है: माँ लक्ष्मी मंत्र, पूजा विधि और आरती
दिवाली या दीपावली सनातनियों (हिंदुओ) के लिए सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव है। यह पर्व सभी को अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने की सीख देता है। इसके अलावा दिवाली का अपना सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। हिंदू इस त्योहार को पूरे हर्ष उल्लास और खुशी की भावना से मनाते हैं और अपने परिवारों के साथ अपनी खुशियाँ साझा करते हैं। दीपावली को रोशनी और खुशियों का त्योहार कहा जाता है इसका एक मुख्य आकर्षण (धनतेरस, नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजन) गणेश और लक्ष्मी पूजा है। भारत को त्योहारों के देश से जाना जाता है। दिवाली भारत और हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहारो में से एक है। यह एक ऐसा देश है, जहां पर्व त्योहार लोग बड़े धूमधाम से मनाते हैं। भारत में पर्व-त्योहारों को यूं ही नहीं मनाया जाता, त्योहारों को मनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक छिपे हैं।
लक्ष्मी देवी जो विष्णु की पत्नी है उनको किसी के जीवन में धन-समृद्धि लाने के लिए जाना जाता है। वही भगवान गणेश को जीवन में जब भी कोई नया या शुभ कार्य आरम्भ करने पर प्रार्थना करने का रिवाज है। इस साल दिवाली 12 नवंबर, 2023 रविवार को पड़ेगी।
दिवाली या दीपावली क्यों मनाई जाती है।
दिवाली को लोग कही दीपावली तो कही दिवाली कह के पुकारते है। दिवाली मनाने के पीछे एक बेहद दिलचस्प वजह है। आइए आज इस बात पर एक नजर डालते हैं कि भारतीय संस्कृति में प्रकाश और विविधता का त्योहार दिवाली क्यों मनाया जाता है। इस उत्सव को आयोजित करने का ऐतिहासिक कारण क्या है?
दिवाली मनाने के मुख्यतः कारण
मुख्यतः कारण यह है कि मर्यादा पुरूषोत्तम प्रभु श्री राम 14 वर्ष के वनवास के बाद धार्मिक नगरी अयोध्या लौटे थे और उनकी खुशी में अयोध्यावासियों ने तीर्थस्थल पर घी दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। जैसा कि रामचरितमानस में वर्णित है। रानी कैकई की दासी मंथरा ने षडयंत्र रच कर राजा दशरथ से भगवान श्री राम को 14 वर्ष के लिए वनवास दिलवा दिया था। दरअसल, रानी कैकई अयोध्या का राजा अपने पुत्र भरत को बनाना चाहती थी, लेकिन भगवान श्री राम भाइयों में सबसे बड़े थे और सभी भाइयों के प्रिय थे। इसलिए भगवान राम के वनवास जाने के बाद भी भरत राजा नहीं बने और भगवान श्री राम के वनवास से लौटने का इंतजार करते रहे।
भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर का वध
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने क्रूर राक्षस नरकासुर का वध किया था। राक्षस के इस वध से लोगों में बहुत खुशी हुई और खुशी में लोगों ने घी के दीपक जलाए। इसके साथ ही, इस दिन समुद्र के हिंसक कंपन के बाद, लक्ष्मी और धन्वंतरि प्रकट हुए। जैन धर्म के अनुयायियों के अनुसार दिवाली 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस पर भी पड़ती है। ये सभी बातें दिवाली को बेहद खास बनाती हैं।
दिवाली का परम्परा
दिवाली आने से पहले लोग अपने घर और आस-पास की अच्छे से साफ-सफाई करते हैं और उन्हें साफ-सुथरा रखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अगर घर का कोई हिस्सा अशुद्ध हो तो देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं और घर में प्रवेश नहीं करती हैं। लोग ऐसी चीज़ें दे दान देते हैं जिनकी उन्हें अब आवश्यकता नहीं है। धनतेरस से शुरू होकर, लोग अपने घरों के अंदर 'चमुखी' दीपक जलाते हैं और लक्ष्मी जी और गणेश जी की विस्तृत पूजा करते हैं।
दिवाली का पूजा विधि
महालक्ष्मी पूजा करने वाले को स्नान करके नया या धुला हुआ शुद्ध कपडे को धारण करें, पूजा की शुरुआत शुभ मुहूर्त में माथे पर तिलक लगा कर करे। हिन्दू धर्म में पूजा करते समय दीपक का बहुत उपयोगिता होती है। सभी पूजा यही से शुरुआत होती है। दिवाली पर नई लक्ष्मी जी और गणेश जी प्रतिमा खरीदने और उसे अपने घर में लगाने का चलन है। अपने घरो के मंदिर में हस्तनिर्मित मिट्टी की मूर्तियाँ लगाना चाहिए। घर में मंदिर को अच्छी तरह से साफ करना चाहिए और लक्ष्मी जी और गणेश जी के सामने दीपक जलाना चाहिए। लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना चाहिए और लक्ष्मी गणेश जी की आरती गानी चाहिए। स्वास्थ्य, धन और समृद्धि के लिए लक्ष्मी कुबेर मंत्र का भी जाप करना चाहिए। पूजा के बाद, पारंपरिक दिवाली प्रसाद जिसमें खीर बताशा, मुरमुरे और मोतीचोल के लड्डू शामिल होते हैं, उन्हें अपने घर और आस पड़ोस में वितरित किया जाना चाहिए।
महालक्ष्मी मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता, नमस्त्यै नमस्त्यै नमस्त्यै नमस्त्यै नमों नम:।
जय देवी जय देवी जय महालक्ष्मी।
वससी व्यापकरुपे तू स्थूलसूक्ष्मी।।
जय देवी जय देवी जय महालक्ष्मी।
वससी व्यापकरुपे तू स्थूलसूक्ष्मी।।
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:,
ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ अमृतलक्ष्म्यै नम:,
ॐ कामलक्ष्म्यै नम:,
ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:,
ॐ योगलक्ष्म्यै नम:।।
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दिवाली कितने दिन मनाया जाता है।
वैसे तो लोग काफी पहले से ही दिवाली के जश्न में डूब जाते हैं, लेकिन मुख्य रूप से इस त्योहार की रौनक 5 दिनों तक देखने को मिलती है। सबसे पहले धनतेरस का त्योहार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इस दिन नए कपड़े और बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। अगले दिन नरक चतुर्दशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था, जिसे हम छोटी दिवाली के नाम से भी जानते हैं। कार्तिक अमावस्या के तीसरे दिन दिवाली का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। अमावस्या की अंधेरी रात में दीपक की रोशनी उसे रंगीन बना देती है। अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से गोवर्धन बनाकर उसे अर्पित किया जाता है। आखिरी दिन भैया दूज के साथ यह त्योहार समाप्त होता है।
मौजूदा दौर में दिवाली हमारे देश का सबसे लोकप्रिय और खुशी का त्योहार माना जाता है। दिवाली से पहले लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं और अपने घरों को अलग-अलग रोशनी और रंगों से सजाते हैं। इस दिन सभी संप्रदायों के लोग एक साथ आते हैं और बहुत खुशी के साथ जश्न मनाते हैं।
Frequently asked questions (FAQ)
2023 में दिवाली कब है?
इस साल दिवाली 12 नवंबर, 2023 रविवार को पड़ेगी।
दिवाली कितने दिन मनाया जाता है?
मुख्य रूप से इस त्योहार की रौनक 5 दिनों तक देखने को मिलती है। कार्तिक अमावस्या के तीसरे दिन दिवाली का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें देवी लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है।
दिवाली मनाने के मुख्यतः कारण?
कारण यह है कि मर्यादा पुरूषोत्तम प्रभु श्री राम 14 वर्ष के वनवास के बाद धार्मिक नगरी अयोध्या लौटे थे और उनकी खुशी में अयोध्यावासियों ने तीर्थस्थल पर घी दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था।
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